नर्मदा को प्रदूषण से बचाने का जुनून, 80 वर्ष की उम्र में लक्ष्मीबाई बना रही आटे के दीपक

नर्मदा को प्रदूषण से बचाने का जुनून, 80 वर्ष की उम्र में लक्ष्मीबाई बना रही आटे के दीपक

खरगोन। नर्मदा तट के नावडाटौड़ी क्षेत्र में शालीवाहन आश्रम के समीप एक छोटी सी कुटिया इन दिनों असाधारण आस्था और पर्यावरण चेतना का केंद्र बनी हुई है। यहां रहने वाली 80 वर्षीय लक्ष्मीबाई नर्मदा जयंती से पहले दिन-रात आटे के दीपक गढ़ने में जुटी हैं। दरअसल यह साधारण सा दिखने वाला कार्य वास्तव में नदी संरक्षण, जीव कल्याण और सच्ची भक्ति का अनूठा उदाहरण बन चुका है। लक्ष्मीबाई के आंगन, कुटिया के भीतर रखी कोठियां, बर्तन और फर्श हर जगह आटे के दीपक सजे हैं। इनकी संख्या हजारों में है।
80 वर्षीय लक्ष्मीबाई बताती हैं कि जब लोग मुझसे पूछते हैं कि इस उम्र में भी वे दिन रात आटे के दीपक क्यों बनाती हैं, तो मैं कोई बड़ा भाषण नहीं देती। बस इतना कहती हूं कि मां नर्मदा ने जो दिया, वही उसे लौटाने की कोशिश कर रही हूं।
उनके लिए यह काम कोई सेवा प्रोजेक्ट या अभियान नहीं है। यह उनके साधना है, धर्म है और पर्यावरण संरक्षण भी।
लक्ष्मीबाई मूल रूप से धार जिले के धरमपुरी क्षेत्र की रहने वाली है  वर्षों पहले मां नर्मदा की परिक्रमा पर निकली थी। परिक्रमा ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। वे बताती हैं कि नर्मदा को अलग-अलग रूपों में देखा। कहीं शांत, कहीं उफनती हुई, कहीं बेहद सुंदर तो कहीं बेहद पीड़ित।
सबसे ज्यादा पीड़ा तब हुई, जब मैंने देखा कि लोग मां नर्मदा की पूजा तो कर रहे हैं, लेकिन उसी पूजा से उसे गंदा भी कर रहे हैं। प्लास्टिक की थैलियां, मोम के दीपक, थर्माकोल, फूलों के ढेर सब कुछ नदी में बहाया जा रहा था। मन में सवाल उठा कि क्या यही भक्ति है?
मैंने कई घाटों पर देखा कि दीप जलाने के बाद वही दीप नदी में फेंक दिए जाते हैं। मोम और केमिकल से बने दीप न गलते हैं, न घुलते हैं। वे पानी को दूषित करते हैं, मछलियों को नुकसान पहुंचाते हैं।
मुझे लगा कि अगर यही चलता रहा, तो आने वाली पीढ़ी को हम कैसी नर्मदा सौंपेंगे। उसी दिन मैंने मन ही मन तय कर लिया कि अगर दीप जलाना है, तो ऐसा दीप हो जो मां नर्मदा को नुकसान न पहुंचाए।
बचपन में मैंने बुजुर्गों को आटे के दीप बनाते देखा था। याद आया कि आटा पूरी तरह प्राकृतिक होता है। जल में जाने पर वह गल जाता है, मछलियों और जलीय जीवों के काम आता है। इसी से उन्हें नर्मदा जयंती पर आटे के दीप जलाने का विचार आया।
लक्ष्मीबाई ने कहा कि नर्मदा परिक्रमा पूरी होने के बाद मेरा मन वापस गांव में नहीं लगा। मैंने नावडाटौड़ी क्षेत्र में शालीवाहन आश्रम के पास एक छोटी सी कुटिया बना ली। यही मेरा घर है, यही मेरा संसार।
हर साल नर्मदा जयंती से पहले मेरा जीवन आटे के दीपक बनाने में लग जाता है। उनकी कुटिया, आंगन, कोठियां, बर्तन और रस्ते में हर जगह दीप ही दीप नजर आते हैं।
लक्ष्मीबाई के अनुसार उनके पास कोई आय का साधन नहीं है। जो भी श्रद्धालु कुछ दान दे देते हैं, उसी से आटा खरीदा जाता है। उसी आटे से दीपक बनते हैं। खास बात यह है कि वे इन दीपकों को बेचती नहीं। उनका मानना है कि यह कोई व्यापार नहीं है। वे इन्हें निशुल्क देती हैं। उनकी खुशी इसी में है कि लोग इन दीपकों से घाट सजाएं और बाद में वही दीप मछलियों का भोजन बनें।
सुबह से शाम तक लक्ष्मीबाई आटा गूंथती, उसे दीप का आकार देती और सुखाने रखती है। लक्ष्मीबाई दीपक बनाते समय भावुक होकर कहती है कि उम्र के कारण हाथ थक जाते हैं  कमर भी जवाब देती है। लेकिन मन को संतोष मिलता है।
हर दीप बनाते समय वे मां नर्मदा का नाम लेती है। उन्हें लगता है कि यह भाव जब दीप जलता है, तो जल के साथ दूर तक बहता है।
परिक्रमा के अनुभव साझा करते हुए वे बताती हैं कि अक्सर लोग भूल जाते हैं कि नदी सिर्फ इंसानों की नहीं होती। उसमें मछलियां हैं, कछुए हैं, असंख्य जीव हैं। उनका भी उतना ही अधिकार है।
जब आटे के दीप जलने के बाद ठंडे होकर पानी में जाते हैं, तो मछलियां उन्हें खा लेती हैं। उन्हें यह सोचकर बहुत सुकून मिलता है कि पूजा का बचा हुआ अंश किसी जीव के काम आ रहा है।
आटे के दीपकों से घाटों पर गंदगी नहीं फैलती। न प्लास्टिक बचता है, न मोम। घाट स्वच्छ रहते हैं, पानी प्रदूषित नहीं होता।
उनके लिए यही सच्ची भक्ति है। जिससे प्रकृति को नुकसान नहीं हो।
लक्ष्मीबाई के इस काम की सराहना कई मंचों से हो चुकी है। कसरावद में शिव महापुराण कथा के दौरान व्यासपीठ से उनके प्रयासों का उल्लेख हुआ। महेश्वर किले में आरती के समय भी लोगों ने उनके काम की प्रशंसा की। इस पर लक्ष्मीबाई का कहना है कि उन्हें मंचों की सराहना से ज्यादा खुशी तब होती है, जब कोई श्रद्धालु प्लास्टिक या मोम का दीप छोड़कर आटे का दीप चुनता है। उसी पल उन्हें लगता है कि मेरी मेहनत सफल हुई। उनका मानना है कि लोग पर्यावरण संरक्षण को बहुत बड़ा और कठिन काम मानते हैं। लेकिन उन्हें ऐसा नहीं लगता। यह रोज के छोटे फैसलों से शुरू होता है। अगर हम पूजा में ही प्रदूषण न करें, तो आधी समस्या वहीं खत्म हो जाती है।
लक्ष्मीबाई की इच्छा है कि नर्मदा जयंती के दिन जब हजारों दीप घाटों पर जलेंगे, तो बस यही प्रार्थना है कि यह रोशनी लोगों के मन तक पहुंचे।
मां नर्मदा को हमने देवी माना है तो उसकी रक्षा भी हमारा धर्म होना चाहिए।
उन्होंने जो रास्ता चुना है वह बहुत छोटा है। वे कोई बड़ा बदलाव नहीं कर सकती। लेकिन अगर उनके आटे के दीप देखकर कोई एक व्यक्ति भी यह सोच ले कि भक्ति और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं तो वे समझेंगी कि उनका जीवन सफल हो गया।
तेरा तुझको अर्पण ही उनके लिए यही नर्मदा भक्ति है। यही पर्यावरण संरक्षण है।

Comments